Tumhen jab chalna ho poem Hindi Motivational Alok Mishra

 

पथ पर जो चलो तुम पथिक,
एक-एक पग में अडिग विश्वास रखो।
चलो, तो स्वयं चलो और
भाग्य से पृथक, अपने कर्मों को सजग करो।
प्रवाह में विचलित
वो टूटी टहनी न बनो
जो वहीँ तक जाएगी जहाँ नदी ले जाये!
अपने अस्तित्व का बोध करो,
स्वयं अपना भाग्य रचो।
पथ पर जो चलो तुम पथिक,
एक-एक पग में अडिग विश्वास रखो।

भूभाग के अंत में क्या है?
जलाशयों की सिमा कहाँ है?
नभ का विन्यास कहाँ तक
और ऊर्जा अनंत जहाँ है;
पहुँच सको जो तुम वहाँ तक, हे पथिक
भ्रमित न हो – ये है क्षितिज।
और अभी है बाकि पथ में,
बैठे बिना मनोरथ के रथ में –
गतिशील रहो – गतिमान रहो।
पथ पर जो चलो तुम पथिक,
एक-एक पग में अडिग विश्वास रखो।

 

a poem by Alok Mishra