Main – A Hindi Poem
बस अब डूबता ही समझ लो मुझे भी की लहरों से टकराने का अब बस मन नहीं। बहुत खुशनसीब था मैं की ज़िन्दगी मिली की अब मर जाने का भी खास गम नहीं।। हँस लिये, रो लिये दो-चार पुष्प हिस्से के…
बस अब डूबता ही समझ लो मुझे भी की लहरों से टकराने का अब बस मन नहीं। बहुत खुशनसीब था मैं की ज़िन्दगी मिली की अब मर जाने का भी खास गम नहीं।। हँस लिये, रो लिये दो-चार पुष्प हिस्से के…
I smoke ink to end my craving; inhale life and omit imagination; when on high dosage, I might, too, excel the reality… such is the story of my marijuana! This is a modernist poem (if I may say so) linking…
The Mute City Night The night roars in its mute voice! City walks; city sleeps; city makes love, and city murders. The night roars in its mute voice! City lies on the footpath amid the mist and fog that…
Buddha – the escapist? The old man selling tea, Young men with office-burden Decorated on their back Walk on the road And I walk the same Thinking of world, wisdom and woe. Heavy steps I raise Nearing the door of…
काश की हमने समंदर से यूँ किनारा न किया होता, और बढ़ाई न होती साहिलों से दोस्ती अपनी, फिर आज हममें भी लहरों की रवानी होती। पर करते भी क्या जब मौजों को ये मुनासिब न था? सितम करते हैं…
चलो हमने कुछ दिया या नहीं मुहब्बत में पर तुमने तो, हाँ, बेवफाई ही दी हमें! Chalo hamne kuchh diya ya nahi muhabbat me par tumne to, han, bewafai hi di hame! वो चाँद भी कोसता होगा चाँदनी को अपनी…
बिखरे पते, सूखे वन-उपवन, प्यासे जलाशय, व्याकुल मानव मन... मैं वहाँ भी था! जाने कितने दुःशासन, कितने महाभारत समर और कितनी द्रौपदियों के चीर हरण, हाँ, मैं वहाँ भी था! खिले वसंत की अरुणाई, मानो संसार के मुख मंडल पे…
People have been constantly asking me how did I manage to take Ashvamegh to this height. They often question me about the magazines and how to get them in terms of the readers. Some other, who have been running a…
Shall I? Will You? Well, though I know the soul is immortal, yet, to get ashore of the vale of mortality, it needs another fragment of the whole of purity. So, where to find you, dear love? Though I see…
जल श्वानों के शौक हैं तैराकी मस्ती जल के सैलाबों में, यहाँ थकती है माँ कि छाती, बढती है वो निरंतर बिना बैठे और सुस्ताती | लिये गगरी वो निकल पड़ी खाली पैर बालू के चादर पे, हे नभ…