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मैं वहाँ भी था। Main Wahan Bhi Tha | Hindi Poem |

बिखरे पते, सूखे वन-उपवन, प्यासे जलाशय, व्याकुल मानव मन... मैं वहाँ भी था! जाने कितने दुःशासन, कितने महाभारत समर और कितनी द्रौपदियों के चीर हरण, हाँ, मैं वहाँ भी था! खिले वसंत की अरुणाई, मानो संसार के मुख मंडल पे आभा हो नयी कोई खिल आयी, मैं वहाँ भी था! कर्मठ शरीर के कर्मकांड, मानवी के वो क्षमा-त्याग और वक्त-पथ पे बढ़ता जीवन, हाँ, मैं वहां भी था... हूँ सदा, [...]

By | October 17th, 2016|Hindi Poems|0 Comments

Poem Dedicated to Women of Rajsthan Who Walk Endlessly for Water

जल   श्वानों के शौक हैं तैराकी मस्ती जल के सैलाबों में, यहाँ थकती है माँ कि छाती, बढती है वो निरंतर बिना बैठे और सुस्ताती | लिये गगरी वो निकल पड़ी खाली पैर बालू के चादर पे, हे नभ इन्हें क्षमा कर दे माँ कि ममता को तो आदर दे ! बातें होतीं बड़ी बड़ी यहाँ बूंदों को लोग तरसते हैं, यहाँ अश्रु पड़ते हैं पिने, वहाँ फुहारों में [...]

By | October 2nd, 2016|Hindi Poems|0 Comments

Sudden Thoughts | Poem

Sudden Thoughts All those, in fact, tantamount, and I count, construe and discern the hours, minutes, seconds and days, plenty or one? Bright light or pleasant horizon? Well, now I know... At times, we are compelled to reciprocate to our heart's feelings... in words... in actions or any other way. Can you resist? I could not and this poem is the result!  

By | October 1st, 2016|Poems|0 Comments

Hindi Poem on JNU Anti India Slogans

Hindi Poem to all those who are supporting the anti-national activities in JNU under the camouflage of 'freedom of speech'. देशद्रोहियों को समर्पित एक कविता कवि - आलोक मिश्रा माँ भारती की पीड़ा ये कैसी आजादी? by - Alok Mishra https://twitter.com/PoetAlok_Mishra/status/700232077350871040 "काश्मीर मांगे आजादी" अरे वो तो चाहते हैं चैन की ज़िन्दगी सुकून और खुशहाल दिन नहाया सूरज के धुप में जो आती है माँ भारती के आँचल की खुशबु [...]

By | February 16th, 2016|Hindi Poems, Poems|7 Comments

Poem on Humanity Who Am I

  A Poem on Humanity by Alok Mishra Who am I? I sleep on the bed called earth; I cover myself from cold and sun with the cloth called sky. I came from the land of terror; I could barely save the carcass that breaths death! I need a place, and solace; I need sympathy and love. I need no more the shadows of guns and military dress. I need [...]

By | December 25th, 2015|English Poems, Poems|1 Comment