Alok Mishra

प्रेम, तुम, मैं और हम…

My Poetic Angst Alok Mishra poem

मेरे स्वप्नों को
वसंत-स्वप्न के बाहर
प्रेम-सत्य की धरा पर,
कुछ ऐसे तुमने उतारा है, प्रिये,
मानो जीवंत हो गए हों पुनः
वो सारे पुष्प जो मुरझाये से थे
रेतीले सागर के गहराई में,
पीड़ित,वंचित और उपेक्षित से।

छूकर प्यार को,
प्यार के एक स्पर्श मात्र से
ह्रदय तले, किंचित कुचले स्वरों में
सरस्वती का पुनः वास हुआ
और आकांक्षाएं रूप लेने लगीं
मेरी नजरों में – बस तुम्हारी छवि सी!

और कितना प्रयत्न करूँ
बचाने का प्यार की अग्नि से अपने अस्तित्व को

मैं तो कबका जलके तुम्हारे प्यार में
बस तुम्हारा हो गया, प्रिये!

Dedicated to M
as always…

the moments we wish stay with us forever, at the least!

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