#MyWords Poetry Series

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मेरे शब्द | My Words | Poem Two

  वो खास पल भी और घड़ियाँ भारीपन के बस ऐसे ही निकल से गये जैसे रेत हाथों से और पतझड़ में वृक्ष से पत्ते। दिन और रात की आँख-मिचौनी, सूनेपन और अपनेपन की बीच का वो फासला, 'मैं' और 'मेरे' बीच की वो दिवार - हाँ - जिंदगी तो रही निकलती बस कुछ ऐसे ही ... फिर से बैठा हूँ आज चाँदनी रात में साथ उनके जो हमेशा मेरे [...]

By | October 12th, 2017|#MyWords Poetry Series|0 Comments

मेरे शब्द | My Words | Web Poetry Series – Poem One

  जाने क्यूँ ये शब्द मेरे व्याकुल हैं तुम्हारे सान्निध्य को, एक बार फिर से? तुमने ही तो ठुकराया था इन्हें, अपनी ख़ामोशी से जब मैंने पूछे थे कुछ सवाल। मैं तो शायद समझ भी लूँ अपनी विवशता और मौन हो जाऊँ फिरसे पर ये शब्द मेरे तो बंध नहीं सकते किसी मानव बंधन में! स्वतंत्र हैं स्वाधीन थे स्वाभिमानी ही रहेंगे और पिरोते रहेंगे एक एक करके कविताएँ कल [...]

By | October 3rd, 2017|#MyWords Poetry Series|0 Comments